रामचरितमानस: भाग 40 का रहस्योद्घाटन

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रामचरितमानस: भाग 40 का रहस्योद्घाटन
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श्री रामचन्द्राय नमः

दिव्य भक्ती का सागर, श्री रामचरितमानस का मर्म

पुण्य, पाप हरने वाला, सदा शिव का स्वरूप, विज्ञान और भक्ति प्रदान करने वाला, माया-मोह के अंधकार को दूर करने वाला, परम निर्मल, प्रेम और शुभ से परिपूर्ण यह श्री रामचरितमानस। जो भक्त इस महान ग्रंथ में प्रेमपूर्वक गोते लगाते हैं, वे संसार रूपी अग्नि की प्रखर किरणों से कभी नहीं जलते।

मोह में फंसे अधमों की वाणी

दोहा:
कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच॥

भावार्थ: जो मनुष्य मोह रूपी पिशाच के वश में हैं, जो पाखण्डी हैं, भगवान से विमुख हैं और जो सच-झूठ में भेद नहीं कर पाते, ऐसे अधम मनुष्य ही इस प्रकार की बातें करते और सुनते हैं।

अज्ञानता का अंधकार

चौपाई:
अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकुर मन लागी॥
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी॥1॥

भावार्थ: जो अज्ञानी, मूर्ख, अंधे और दुर्भाग्यशाली हैं, जिनके मन रूपी दर्पण पर विषय-वासना की काई जम गई है, जो व्यभिचारी, कपटी और अत्यंत कुटिल हैं, जिन्होंने कभी स्वप्न में भी सज्जनों की सभा नहीं देखी है,

कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी॥
मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना॥2॥

भावार्थ: वे ही वेद-विरोधी बातें करते हैं, जिन्हें अपने लाभ-हानि का ज्ञान नहीं है। जिनका हृदय रूपी दर्पण मलिन है और जो नेत्रहीन हैं, वे बेचारे श्री रामचन्द्रजी का रूप कैसे देख सकते हैं!

जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका॥
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं॥3॥

भावार्थ: जिन्हें निर्गुण और सगुण का भेद समझ नहीं आता, वे अनेक मनगढ़ंत बातें बोलते हैं। जो हरि की माया के वश में होकर संसार में भटक रहे हैं, उनके लिए कुछ भी कहना असंभव नहीं है।

बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे॥
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना॥4॥

भावार्थ: जो विक्षिप्त हैं, भूत-प्रेत से ग्रसित हैं या नशे में चूर हैं, वे विचारकर वचन नहीं बोलते। जिन्होंने महामोह की मदिरा पी ली है, उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

संदेह का त्याग, राम की शरण

सोरठा:
अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद।
सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम॥

भावार्थ: अपने हृदय में ऐसा विचार कर, संदेहों को त्याग कर श्री रामचन्द्रजी के चरणों का स्मरण करो। हे गिरिराजपुत्री (पार्वती)! भ्रम रूपी अंधकार को दूर करने वाले सूर्य की किरणों के समान मेरे वचनों को सुनो!

सगुण और निर्गुण का एकत्व

चौपाई:
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥1॥

भावार्थ: सगुण और निर्गुण में कोई भेद नहीं है। मुनि, पुराण, पंडित और वेद सभी ऐसा गाते हैं। जो निर्गुण, निराकार, अलक्ष्य और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर सगुण रूप धारण करता है।

जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥
जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥2॥

भावार्थ: जो निर्गुण है, वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओले में कोई भेद नहीं है (दोनों जल ही हैं), उसी प्रकार निर्गुण और सगुण एक हैं। जिसका नाम भ्रम रूपी अंधकार के लिए सूर्य है, उसके लिए मोह की बात ही कैसे कही जा सकती है?

राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥
सहज प्रकासरूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥3॥

भावार्थ: श्री रामचन्द्रजी सच्चिदानंद स्वरूप सूर्य हैं। उनमें मोह रूपी रात्रि का जरा भी अंश नहीं है। वे स्वभाव से ही प्रकाशमान भगवान हैं, वहाँ अज्ञान रूपी रात्रि का कोई स्थान नहीं है।

हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानंद परेस पुराना॥4॥

भावार्थ: हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंकार और अभिमान – ये सब जीव के धर्म हैं। श्री रामचन्द्रजी तो व्यापक ब्रह्म, परमानंद स्वरूप, परमेश्वर और पुराण पुरुष हैं। इस बात को सारा संसार जानता है।

शिव का नमन

दोहा:
पुरुष प्रसिद्ध प्रकाश निधि प्रगट परावर नाथ।
रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ॥116॥

भावार्थ: जो पुरुष प्रसिद्ध हैं, प्रकाश के भंडार हैं, सब रूपों में प्रकट हैं, सभी के स्वामी हैं, वे ही रघुकुल के मणि श्री रामचन्द्रजी मेरे स्वामी हैं – ऐसा कहकर शिवजी ने उन्हें मस्तक नवाया।

अज्ञानियों का भ्रम

चौपाई:
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥
जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी॥1॥

भावार्थ: अज्ञानी मनुष्य अपने भ्रम को नहीं समझते और वे मूर्ख जीव प्रभु पर मोह का आरोप लगाते हैं। जैसे आकाश में बादलों को देखकर अज्ञानी लोग कहते हैं कि बादलों ने सूर्य को ढक लिया है।

चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥
उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥2॥

भावार्थ: जो आँख में उंगली लगाकर देखता है, उसके लिए तो दो चंद्रमा दिखाई देते हैं। हे पार्वती! श्री रामचन्द्रजी के विषय में इस प्रकार मोह की कल्पना वैसी ही है, जैसे आकाश में अंधकार, धुआं और धूल दिखाई देता है।

बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥3॥

भावार्थ: विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीवात्मा – ये सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और चेतन होते हैं। इन सबका जो परम प्रकाशक है, वही अनादि ब्रह्म, अयोध्या नरेश श्री रामचन्द्रजी हैं।

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥
जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥4॥

भावार्थ: यह जगत प्रकाश्य है और श्री रामचन्द्रजी इसके प्रकाशक हैं। वे माया के स्वामी, ज्ञान और गुणों के धाम हैं। उन्हीं की सत्यता के कारण, मोह की सहायता से जड़ माया भी सत्य प्रतीत होती है।

जारी रहेगा…

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥

  • आरएन तिवारी

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