अरावली की बदलती परिभाषा: पर्यावरण मंत्री रमेश ने उठाई गंभीर चिंता, जानिए क्या है पूरा मामला
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक महत्वपूर्ण खबर के हवाले से अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका दावा है कि केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने उच्चतम न्यायालय से अरावली पहाड़ियों की एक नई परिभाषा की सिफारिश की है। यह बदलाव, जैसा कि रमेश ने उजागर किया है, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर दूरगामी और गंभीर परिणाम डाल सकता है।
क्या है अरावली की नई परिभाषा का मामला?
जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर साझा की गई जानकारी में बताया कि अरावली पहाड़ियां, जो दिल्ली से हरियाणा और राजस्थान होते हुए गुजरात तक फैली हुई हैं, लंबे समय से अवैध खनन, निर्माण और अन्य विकासशील गतिविधियों से प्रभावित रही हैं। इन गतिविधियों के कारण यह विशाल पारिस्थितिकी तंत्र पहले ही काफी हद तक तबाह हो चुका है। अब, उन्होंने जिस खबर का हवाला दिया है, उसके अनुसार, मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित नई परिभाषा खनन को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से लाई गई है। हालांकि, रमेश का मानना है कि इस नई परिभाषा का असली मतलब यह होगा कि अरावली पहाड़ियों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अब “अरावली” के रूप में नहीं गिना जाएगा।
तत्काल समीक्षा की आवश्यकता पर जोर
रमेश ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय ने इस संशोधित परिभाषा को स्वीकार कर लिया है। यह उनके अनुसार “विचित्र” है और इसके पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर “बहुत गंभीर परिणाम” होंगे। उन्होंने इस मुद्दे की तत्काल समीक्षा की मांग की है। उनका यह बयान पीटीआई के इनपुट के साथ सामने आया है, जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बदलाव के खिलाफ क्या कदम उठाए जाते हैं और पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में क्या कार्रवाई होती है।
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