मनरेगा: रोजगार की गरिमा पर सवाल, प्रियंका गांधी ने लोकसभा में उठाया मुद्दा
मनरेगा, देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़, आज लोकसभा में चर्चा का विषय बना। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने मनरेगा के नाम में बदलाव के प्रस्ताव का पुरजोर विरोध करते हुए, इस ऐतिहासिक कानून की उपलब्धियों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों से मनरेगा न केवल करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती भी दे रहा है।
क्रांतिकारी कानून, सर्वसम्मति से पारित
प्रियंका गांधी ने याद दिलाया कि मनरेगा को इसी सदन ने सर्वसम्मति से पारित किया था, एक ऐसा क्रांतिकारी कदम जिसने ग्रामीण भारत के सबसे वंचितों को 100 दिनों के रोजगार का अधिकार दिया। उन्होंने कहा, “जब हम अपने क्षेत्रों में जाते हैं, तो दूर से ही पहचान हो जाती है कि मनरेगा का मजदूर कौन है। सबसे गरीब होता है, चेहरे पर झूरियां होती है, उनके हाथ पत्थरों की तरह कठोर होते हैं क्योंकि इतनी मजदूरी करते हैं।” यह जीवंत चित्रण देश के आम आदमी के संघर्ष और मनरेगा की अहमियत को बयां करता है।
मांग-आधारित कानून पर केंद्र का शिकंजा?
मनरेगा की मूल भावना को समझाते हुए, प्रियंका गांधी ने बताया कि यह एक मांग-आधारित कानून है। रोजगार की मांग होने पर, उसी के अनुसार काम मिलता है, और 100 दिनों का रोजगार देना सरकार की अनिवार्यता है। यहां तक कि केंद्र सरकार से पूंजी की आपूर्ति भी मांग के आधार पर ही की जाती है। “कितने पैसे कहां भेजे जाएं, यह सब मांग पर निर्भर करता है।”
संविधान की भावना से खिलवाड़?
लेकिन, नए विधेयक के माध्यम से केंद्र सरकार को यह अधिकार देने का प्रस्ताव, जिसमें वह पहले ही तय कर सकेगी कि कितनी पूंजी कहां भेजी जाएगी, प्रियंका गांधी ने इसे संविधान की भावना की अनदेखी बताया। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि यह बदलाव मनरेगा के मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है और उन लोगों के अधिकारों पर कुठाराघात कर सकता है जिनकी यह योजना सबसे ज्यादा मदद करती है।
यह बहस मनरेगा की प्रासंगिकता और उसके भविष्य पर एक महत्वपूर्ण मोड़ है, और प्रियंका गांधी की आवाज ने ग्रामीण भारत की आवाज को बुलंद करने का काम किया है।
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