
BRICS का नया अवतार: क्या भारत के लिए यह बड़ी ताकत बनेगी या सबसे बड़ी चुनौती?
ब्रिक्स (BRICS) अब महज कुछ देशों का छोटा समूह नहीं रहा। ‘द प्रिंट’ की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, विस्तार के बाद अब 11 देशों वाला यह संगठन वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक नई धमक रखता है। लेकिन, इस बढ़ती ताकत के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है—क्या ब्रिक्स वास्तव में साझा हितों का मंच बनेगा या फिर चीन धीरे-धीरे इसे अपने व्यक्तिगत प्रभाव को बढ़ाने के औजार के रूप में इस्तेमाल करेगा?
किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन में शक्ति का संतुलन ही उसकी दिशा तय करता है। विश्लेषण के अनुसार, फैसले सिर्फ देशों की गिनती से नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक, सैन्य और सामरिक हैसियत से होते हैं। इस तराजू पर तौलें तो ब्रिक्स के भीतर चीन का पलड़ा फिलहाल बाकी सदस्यों के मुकाबले कहीं ज्यादा भारी नजर आता है।
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ड्रैगन का दबदबा और भारत की रणनीतिक दुविधा
चीन और भारत ब्रिक्स के दो सबसे मजबूत स्तंभ हैं, लेकिन दोनों की आर्थिक और सैन्य क्षमताओं में एक बड़ा अंतर है। आशंका यह है कि यदि ब्रिक्स एक अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक गुट बनता है, तो चीन इसका उपयोग अपने हितों को साधने के लिए कर सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है। इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए भारत को अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ की जरूरत है। ऐसे में ब्रिक्स के जरिए चीन को मिलने वाली कोई भी अप्रत्यक्ष मजबूती, भारत के अपने सुरक्षा हितों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
डॉलर बनाम युआन: भारत के लिए कौन सा रास्ता सुरक्षित?
ब्रिक्स के मंच पर लंबे समय से ‘डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarisation) यानी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को खत्म करने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि अमेरिका की नीतियों से भारत की अपनी असहमतियां हो सकती हैं, लेकिन डॉलर को कमजोर करना भारत के लिए पूरी तरह फायदेमंद नहीं है।
असल चिंता यह है कि यदि डॉलर का प्रभाव गिरता है, तो उसकी जगह कौन लेगा? यदि इसका सीधा लाभ चीनी मुद्रा को मिलता है, तो भारत के लिए भविष्य की राह और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। यानी अमेरिका से नाराजगी और चीन का विरोध—इन दोनों के बीच संतुलन बनाना भारत के लिए एक कठिन परीक्षा है।
क्या ब्रिक्स का ‘असरहीन’ रहना ही भारत की जीत है?
इस विश्लेषण का सबसे चौंकाने वाला और रोचक हिस्सा यह तर्क है कि भारत का लक्ष्य ब्रिक्स को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे ‘आंतरिक मतभेदों’ में इतना उलझाए रखना होना चाहिए कि चीन इसे अपने रणनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल न कर सके।
ब्रिक्स के विस्तार को इसी नजरिए से देखा जा सकता है। संगठन में जितने ज्यादा और अलग-अलग विचारधाराओं वाले देश होंगे, किसी एक मुद्दे पर सबकी सहमति बनाना उतना ही कठिन होगा। मध्य पूर्व और एशिया के देशों के बीच मौजूद आपसी मतभेद भारत के लिए एक तरह से ‘बफर’ का काम कर सकते हैं, जिससे किसी एक देश (विशेषकर चीन) का एकाधिकार कायम न हो पाए।
जोखिम भरा रास्ता: अलग-थलग पड़ने का डर
इस रणनीति के अपने खतरे भी हैं। यदि भारत ब्रिक्स की हर बड़ी पहल में ‘रोड़ा’ अटकाता है या उसे कमजोर करने की कोशिश करता है, तो वह समूह के भीतर खुद को अकेला पा सकता है। साथ ही, बीजिंग आर्थिक और सैन्य दबाव के जरिए भारत की मुश्किलों को बढ़ा सकता है।
कुल मिलाकर, भारत के सामने असली चुनौती ब्रिक्स से बाहर निकलने की नहीं, बल्कि समूह के भीतर रहकर अपनी ऐसी जगह बनाने की है जिससे चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सके। ब्रिक्स का विस्तार भारत के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है—अब यह भारत की कूटनीति पर निर्भर करता है कि वह इस मंच को अपने लिए ढाल बनाता है या यह उसके लिए एक नई चुनौती बन जाता है।
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