दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025: प्रवर समिति की रिपोर्ट शीतकालीन सत्र में पेश होगी
नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के सांसद बैजयंत पांडा ने शुक्रवार को यह जानकारी दी कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 पर गठित प्रवर समिति अपनी रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान पेश करेगी। आईबीसी संशोधन विधेयक पर गठित प्रवर समिति के अध्यक्ष बैजयंत पांडा ने बताया कि रिपोर्ट पर प्रगति संतोषजनक रही है और सदस्यों की भागीदारी भी उत्साहजनक रही है।
बैठकें और साक्ष्य: एक गहन प्रक्रिया
हाल ही में, प्रवर समिति ने एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की, जिसमें सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के प्रतिनिधियों से मौखिक साक्ष्य प्राप्त किए गए। इस बैठक में विधेयक के प्रत्येक खंड की गहन जांच की गई और सदस्यों के बीच सार्थक चर्चा हुई।
विशेषज्ञों और हितधारकों से सुझावों का स्वागत
इससे पहले, 21 अक्टूबर को, प्रवर समिति ने विधेयक पर विशेषज्ञों, उद्योग संघों, संगठनों और अन्य हितधारकों से विचार-विमर्श और सुझाव आमंत्रित किए थे। इन महत्वपूर्ण सुझावों को 4 नवंबर तक स्वीकार किया गया था।
विधेयक के मुख्य प्रस्ताव: दक्षता और स्पष्टता की ओर एक कदम
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 में प्रस्तावित यह संशोधन विधेयक कई संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक बदलावों का प्रस्ताव करता है। इसका उद्देश्य ऋणदाता द्वारा आरंभ की गई दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआईआरपी) जैसी नई अवधारणाओं को शामिल करना है, जिससे समाधान और परिसमापन दोनों चरणों में दक्षता में वृद्धि होगी।
वर्तमान चुनौतियों का समाधान: देरी को कम करने का प्रयास
वर्तमान कानून के तहत, कॉर्पोरेट दिवाला समाधान शुरू करने के आवेदन 14 दिनों के भीतर स्वीकार किए जाने चाहिए, लेकिन व्यवहार में यह प्रक्रिया औसतन 434 दिनों तक खिंच जाती है। इस देरी को दूर करने के लिए, आईबीसी संहिता की धारा 7 में संशोधन का प्रस्ताव है, जिससे केवल चूक होने पर ही आवेदन स्वीकार किए जा सकें।
सुव्यवस्थित समाधान प्रक्रिया: प्रमुख सुधार
विधेयक कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) को सुव्यवस्थित करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुधारों का प्रस्ताव करता है। इनमें शामिल हैं:
- परिसंपत्ति बिक्री की अनुमति देने के लिए समाधान योजनाओं की परिभाषा का विस्तार।
- समाधान पेशेवरों के प्रस्ताव में कॉर्पोरेट आवेदक की भूमिका को सीमित करना।
- सरकारी बकाया राशि की प्राथमिकता को स्पष्ट करना।
- सीआईआरपी आवेदनों की वापसी पर कड़े नियंत्रण लगाना।
बैजयंत पांडा के अतिरिक्त, 23 अन्य सांसद इस प्रवर समिति का हिस्सा हैं, जो इस महत्वपूर्ण विधेयक पर गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं।
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