बिहार में चुनावी महासंग्राम: तारीखों का ऐलान, दांव पर प्रतिष्ठा और भविष्य की राह
बिहार की राजनीति में चुनावी बिगुल बज चुका है! 2025 के विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही राज्य में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। 243 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान दो चरणों में, 6 और 11 नवंबर को होगा, और 14 नवंबर को जनता का फैसला सामने आ जाएगा। इससे पहले, 2020 के विधानसभा चुनावों में तीन चरणों में मतदान हुआ था, जिसमें 56.93% वोट पड़े थे।
गठबंधन की कमान और ‘जन सुराज’ का इम्तिहान
सत्ता की इस लड़ाई में, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और महागठबंधन, दोनों प्रमुख गठबंधन पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर चुके हैं। लेकिन इस बार सबकी निगाहें प्रशांत किशोर और उनकी नई राजनीतिक पार्टी ‘जन सुराज’ पर भी टिकी हैं। क्या यह पार्टी बिहार की पारंपरिक जातिगत राजनीति में सेंध लगा पाएगी या फिर अन्य नवोदित दलों की तरह गुमनाम रह जाएगी?
एनडीए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘अवैध घुसपैठ’ जैसे मुद्दों को भुनाने की कोशिश में है, तो वहीं महागठबंधन मतदाता सूची से नाम गायब होने जैसे ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर आक्रामक है। यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है, क्योंकि लोकतंत्र में वोट ही सबसे बड़ा अधिकार और हथियार है। अगर वैध मतदाता वोट डालने से वंचित रह जाएं, तो यह न केवल एक प्रशासनिक खामी होगी, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगी। रिपोर्टों के अनुसार, मतदाता सूची से गायब हजारों नामों में बड़ी संख्या में मुस्लिम बहुल इलाकों के मतदाता शामिल हैं, जो महागठबंधन के लिए चिंता का सबब है, क्योंकि ये इलाके पारंपरिक तौर पर उनके वोट बैंक माने जाते हैं।
कांग्रेस की प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय विमर्श
‘वोट चोरी’ का यह कथित मामला कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है। अगर बिहार में एनडीए जीतता है, तो यह मुद्दा स्वतः ही शांत हो जाएगा। ऐसे में, आने वाले पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल चुनावों में इसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर नतीजे महागठबंधन के पक्ष में आते हैं, तो यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन सकता है और कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों को अन्य राज्यों के चुनावों में इसका लाभ मिल सकता है।
‘रेवड़ी’ की राजनीति और नई सोच
पिछले कुछ वर्षों से, विधानसभा चुनावों में मुफ्त की योजनाओं (रेवड़ियों) का वितरण, खासकर महिलाओं को लक्षित करके, एक राजनीतिक परंपरा बन गई है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। यशवंत देशमुख और अमिताभ तिवारी जैसे चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि इसी के बलबूते नीतीश कुमार एक बार फिर राज्य में बढ़त हासिल कर सकते हैं।
हालांकि, प्रशांत किशोर इस धारणा को चुनौती देते हैं। उनका कहना है कि आंध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी और राजस्थान के अशोक गहलोत जैसे नेताओं ने भी ऐसी ही योजनाएं चलाईं, पर चुनावी नतीजे उनकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे। यही हाल ओडिशा में नवीन पटनायक का भी रहा, जो काफी लोकप्रिय थे। प्रशांत किशोर का मानना है कि केवल लुभावनी घोषणाओं से चुनाव नहीं जीते जाते, बल्कि जनता अब राजनीतिक दलों और सरकारों की विश्वसनीयता भी देखती है।
जदयू का प्रदर्शन और ‘जन सुराज’ की पहली परीक्षा
नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का प्रदर्शन इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, जो यह तय करेगा कि एनडीए या महागठबंधन में से किसकी सरकार बनेगी। प्रशांत किशोर ने यह भी कहा है कि अगर जदयू को इस चुनाव में 25 से ज्यादा सीटें नहीं मिलीं, तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे। चूंकि जदयू और भाजपा लगभग आधी-आधी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, अगर प्रशांत किशोर की भविष्यवाणी सही साबित होती है, तो एनडीए सत्ता से बाहर हो जाएगा।
खुद प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज पार्टी’ के लिए यह चुनाव पहली अग्निपरीक्षा होगी। हमने कई राज्यों में विधानसभा चुनावों में तीसरे राजनीतिक दल की भूमिका देखी है, जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी या आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी, जिन्होंने सत्ता तक का सफर तय किया। लेकिन बिहार में किसी नए राजनीतिक दल ने रातोंरात इतनी बड़ी सफलता हासिल की हो, ऐसा इतिहास नहीं रहा है।
मुस्लिम मतदाताओं का दांव और नया अध्याय
बिहार की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की एक बड़ी भूमिका है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 17% हैं। सवाल यह है कि क्या वे इस चुनाव में ‘जन सुराज पार्टी’ की ओर रुख करेंगे? प्रशांत किशोर युवाओं, शिक्षित वर्गों और शहरी मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मुस्लिम मतदाता पारंपरिक रूप से महागठबंधन के साथ रहे हैं। पिछली बार असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने सीमांचल में अच्छा प्रदर्शन किया था, जिससे महागठबंधन को नुकसान हुआ और उनकी सरकार नहीं बन पाई। ऐसे में, क्या मुस्लिम मतदाता एक ऐसे नए दल पर भरोसा करके वोटों का विभाजन करेंगे, जिसका कोई ठोस अतीत नहीं है?
इन सब चुनौतियों के बावजूद, अगर प्रशांत किशोर अपनी ‘जन सुराज पार्टी’ को एक प्रभावशाली ताकत बना पाते हैं, तो बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है।
जनमत संग्रह का अहसास और राष्ट्रीय प्रभाव
हालांकि भारत में जनमत संग्रह की परंपरा नहीं रही है, बिहार का यह विधानसभा चुनाव एक जनमत संग्रह जैसा ही माना जा रहा है, खासकर ‘वोट चोरी’ के आरोपों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के संदर्भ में। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि बिहार के चुनाव केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श ने हमेशा बड़ी भूमिका निभाई है। बिहार का चुनावी नतीजा निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करेगा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


