रुपये की गिरती चाल: कई मोर्चों पर दबाव, बाजार की बढ़ी चिंता
भारतीय रुपया इन दिनों एक कठिन दौर से गुजर रहा है। जानकारों के अनुसार, यह कोई एक समस्या नहीं, बल्कि कई जटिल कारणों का मिलाजुला परिणाम है, जिसने हमारी राष्ट्रीय मुद्रा को कमजोर कर दिया है।
अनिश्चितता का साया: भारत-अमेरिका ट्रेड डील
इसकी सबसे प्रमुख वजह भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर छाई हुई अनिश्चितता है। डील का लगातार टलना और स्पष्ट दिशा-निर्देशों का अभाव बाजार में गहरी निराशा का माहौल बना रहा है। LKP सिक्योरिटीज के वाइस प्रेसीडेंट (रिसर्च) जतिन त्रिवेदी के अनुसार, “डील में हो रही देरी ने निवेशकों के भरोसे को डगमगा दिया है। अब केवल वादे नहीं, बल्कि ठोस कदमों की उम्मीद है।”
विदेशी निवेशकों की निकासी: डॉलर का बढ़ता प्रभाव
दूसरा बड़ा झटका विदेशी पूंजी के तेजी से बाहर जाने से लगा है। दिसंबर के शुरुआती दो दिनों में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने 4,335 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए। इस साल अब तक यह आंकड़ा 1,48,010 करोड़ रुपये को पार कर चुका है। जब ये निवेशक बड़े पैमाने पर अपने पैसे को डॉलर में बदलते हैं, तो स्वाभाविक रूप से भारतीय रुपये पर बिकवाली का दबाव बढ़ जाता है।
व्यापार घाटे का बढ़ता बोझ: सोने का आयात और निर्यात में गिरावट
तीसरा अहम कारण है तेजी से बढ़ता व्यापार घाटा। अक्टूबर 2025 में यह 41.7 बिलियन डॉलर के अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गया। इसमें सोने का आयात सबसे बड़ी वजह रहा, जो लगभग तीन गुना बढ़कर 14.7 बिलियन डॉलर हो गया। सोने-चांदी की अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमतें हमारे आयात बिल को और बढ़ा रही हैं। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी टैरिफ के कारण अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में 28% की गिरावट आई है, जिसने व्यापार संतुलन को और बिगाड़ा है।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


