नेतन्याहू के बाद ट्रंप का नंबर? चुनाव हारे तो दुनिया में आ जाएगा भूचाल!

By
Aware Media Network
Aware Media Network एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरें, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी...
- News Desk
6 Min Read
नेतन्याहू के बाद ट्रंप का नंबर? चुनाव हारे तो दुनिया में आ जाएगा भूचाल!
नेतन्याहू के बाद अब ट्रंप की बारी, चुनाव हारे तो क्या होगा? समझिए

अमेरिका में होने जा रहे मिड-टर्म चुनावों पर न सिर्फ अमेरिका, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। यह मुकाबला बेहद रोमांचक मोड़ पर है, क्योंकि इसी बात का फैसला होना है कि अगले दो साल तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को संसद का खुला समर्थन मिलेगा या फिर उनके सामने विपक्ष की ऐसी मजबूत दीवार खड़ी हो जाएगी, जिसे लांघना उनके लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। ट्रंप ने अपनी रिपब्लिकन पार्टी की जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है, तो वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी भी संसद के दोनों सदनों में जोरदार वापसी के लिए बेताब है।

आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि जब अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर 4 साल में होता है, तो ये मिड-टर्म इलेक्शन क्या बला हैं? दरअसल, अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल 4 साल का होता है, लेकिन वहां की संसद यानी ‘कांग्रेस’ के चुनाव हर 2 साल पर होते हैं। राष्ट्रपति के 4 साल के कार्यकाल के ठीक बीच में होने वाले इन्हीं चुनावों को ‘मिड-टर्म इलेक्शन’ कहा जाता है। अमेरिकी संसद के दो अहम सदन हैं—पहला ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ और दूसरा ‘सीनेट’। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स को आप भारत की लोकसभा और सीनेट को राज्यसभा की तरह समझ सकते हैं, हालांकि दोनों देशों की चुनावी प्रणाली में एक बड़ा फर्क है।

इसे भी पढ़ें: पाँच राज्यों में बड़ा उलटफेर: वोटर्स की नाराजगी से ट्रंप को झटका, सीनेट में डेमोक्रेट्स को बढ़त

भारत में जहाँ लोकसभा सांसद 5 साल के लिए चुने जाते हैं, वहीं अमेरिका में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सदस्यों का कार्यकाल महज 2 साल का होता है। यही वजह है कि इस बार हाउस की सभी 435 सीटों पर चुनावी रण सजा है। दूसरी ओर, सीनेट में कुल 100 सीटें होती हैं और यहाँ के सांसद 6 साल के लिए चुने जाते हैं। लेकिन सभी सीटों पर एक साथ चुनाव न होकर, हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सीटों पर ही जंग होती है। इस बार 33 नियमित और दो विशेष चुनावों को मिलाकर कुल 35 सीटों पर जनता वोट डाल रही है। 3 अक्टूबर का दिन यह तय करेगा कि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर किस पार्टी का परचम लहराएगा और यही कारण है कि यह मुकाबला डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद निर्णायक है।

फिलहाल, रिपब्लिकन पार्टी के पास हाउस और सीनेट दोनों में ही बहुमत है, लेकिन यह बहुमत बेहद मामूली और नाजुक है। हाउस में रिपब्लिकन पार्टी के पास जादूई आंकड़े से जरा ही ऊपर 218 सीटें हैं, जबकि सीनेट में उनके पास 53 सीटें हैं। ऐसे में, यदि डेमोक्रेटिक पार्टी इनमें से किसी भी एक सदन में बहुमत हासिल करने में कामयाब हो जाती है, तो राष्ट्रपति ट्रंप की मुश्किलें आसमान छूने लगेंगी। इसकी वजह यह है कि अमेरिका में कानून बनाने की असली ताकत कांग्रेस (संसद) के पास ही होती है। राष्ट्रपति भले ही अपनी योजनाएं और विजन पेश कर दें, लेकिन उन्हें अमलीजामा पहनाने के लिए संसद की मुहर और समर्थन अनिवार्य होता है।

इसे भी पढ़ें: Pakistan में अमेरिकी कंपनियों का LNG प्रोजेक्ट पर 4.4 अरब डॉलर निवेश का प्लान

लिहाजा, अगर डेमोक्रेट्स हाउस या सीनेट पर अपना शिकंजा कसने में सफल रहे, तो वे ट्रंप के हर प्रस्ताव को आसानी से रोक सकते हैं, सरकारी बजट पर सवालिया निशान लगा सकते हैं और उनकी नीतियों की फाइलें खंगालनी शुरू कर सकते हैं। यहाँ तक कि ट्रंप प्रशासन के फैसलों की चीरफाड़ के लिए संसदीय कमेटियों का पूरा जोर लगाया जा सकता है। चाहे भ्रष्टाचार के आरोप हों, व्हाइट हाउस में बॉल रूम बनाने का विवाद हो या फिर आईसी एजेंट्स की कार्रवाई—विपक्ष इन तमाम मुद्दों पर ट्रंप सरकार को कटघरे में खड़ा करने से चूकेगा नहीं।

यहाँ तक कि डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की माँग को लेकर भी लगातार सुगबुगाहट रही है। हालाँकि, महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करना और राष्ट्रपति को उनके पद से हटाना दो बिल्कुल अलग संवैधानिक प्रक्रियाएँ हैं, लेकिन यदि रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में अपना बहुमत बचाने में कामयाब रहती है, तो ट्रंप को अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में संसद का भरपूर सहयोग मिलता रहेगा।

अब जरा उन सुलगते मुद्दों पर भी नजर डाल लेते हैं, जिन पर इस बार अमेरिकी अवाम वोटिंग कर रही है। इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा आम आदमी की जेब यानी ‘महंगाई और अर्थव्यवस्था’ है, जहाँ रोजमर्रा की बढ़ती कीमतें, घर का भारी-भरकम खर्च और रोजगार जैसे सवाल जनता के लिए सबसे अहम बन चुके हैं। इसके अलावा, ट्रंप की आक्रामक ‘टेरिफ पॉलिसी’ भी केंद्र में है, जिसके तहत वे दूसरे देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर भारी आयात शुल्क लगाने की नीति पर जोर दे रहे हैं।


Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Share This Article
Follow:
Aware Media Network एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरें, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी संपादकीय टीम विश्वसनीय स्रोतों, आधिकारिक आंकड़ों और पत्रकारिता के नैतिक सिद्धांतों के आधार पर समाचार तैयार करती है।Aware Media Network का उद्देश्य निष्पक्ष, सटीक और समय पर जानकारी प्रदान करना है, ताकि पाठक जागरूक निर्णय ले सकें और समसामयिक घटनाओं को बेहतर ढंग से समझ सकें।
कोई टिप्पणी नहीं

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *