लद्दाख के राजनीतिक भविष्य को लेकर केंद्र सरकार और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का एक और दौर हुआ, लेकिन बैठक से कोई ठोस सहमति सामने नहीं आई। गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और लेह एपेक्स बॉडी (LAB) तथा कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) की सब-कमेटी के बीच हुई चर्चा के बाद प्रतिनिधिमंडल ने निराशा जताई।
लिखित ड्राफ्ट का था इंतजार
लद्दाख के एक्टिविस्ट और LAB से जुड़े सोनम वांगचुक के मुताबिक पिछली बैठक 22 मई को हुई थी। इसके बाद उम्मीद थी कि केंद्र प्रस्तावित लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई लिखित मसौदा पेश करेगा। लेकिन बैठक में ऐसा ड्राफ्ट नहीं दिया गया। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि विधानसभा, परिसीमन और चुनाव जैसे मुद्दों पर पहले भी चर्चा हो चुकी है।
सवालों की सूची, समाधान अभी दूर
वांगचुक के अनुसार बैठक में प्रतिनिधिमंडल को सवालों की एक सूची दी गई और बताया गया कि इन पर अगली बातचीत में चर्चा होगी। इससे यह संकेत मिला कि कई अहम मुद्दों पर अभी सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच विचार-विमर्श बाकी है। प्रतिनिधिमंडल की सबसे प्रमुख मांग लद्दाख में जल्द चुनी हुई विधानसभा स्थापित करने की है।
अक्टूबर में कारगिल में अगली बैठक
बैठक में अक्टूबर के पहले सप्ताह में कारगिल में अगली बातचीत आयोजित करने का प्रस्ताव सामने आया। प्रतिनिधियों को उम्मीद है कि तब केंद्र सरकार अधिक स्पष्ट और ठोस प्रस्ताव के साथ आगे आएगी। वांगचुक का कहना है कि यदि प्रस्ताव आगामी शीतकालीन सत्र में संसद के सामने रखा जाता है, तो चुनाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं के गठन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
मुआवजे पर सकारात्मक संकेत
बैठक में 24 सितंबर 2025 की घटनाओं में मारे गए और घायल लोगों के मुआवजे का मुद्दा भी उठा। वांगचुक के मुताबिक सरकार की ओर से मुआवजे को मंजूरी मिलने और जल्द घोषणा किए जाने की जानकारी दी गई। हालांकि आंदोलन से जुड़े लोगों पर दर्ज मामलों को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
सभी मामले वापस लेने की मांग
प्रतिनिधिमंडल ने मामलों को चरणबद्ध तरीके से वापस लेने के प्रस्ताव के बजाय सभी मामले एक साथ वापस लेने की मांग रखी है। सरकार ने इस पर विचार करने की बात कही है। साथ ही LAB और KDA ने मांग की है कि चुनी हुई लोकतांत्रिक संस्था बनने तक भूमि, प्रशासनिक ढांचे या क्षेत्र के स्वरूप को प्रभावित करने वाले बड़े फैसले रोके जाएं।
आंदोलन नहीं, लेकिन विकल्प खुला
प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि वह आंदोलन नहीं चाहता और बातचीत के जरिए समाधान निकालना उसकी प्राथमिकता है। लेकिन यदि लद्दाख की चिंताओं को नजरअंदाज किया गया, तो आंदोलन का विकल्प खुला रहेगा। अब अक्टूबर की प्रस्तावित बैठक महत्वपूर्ण हो गई है। सवाल यही है कि अगली बार बातचीत सिर्फ सवालों तक सीमित रहेगी या लद्दाख को उसके राजनीतिक भविष्य का ठोस खाका भी मिलेगा।
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