नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े एक छात्र की NSA के तहत हिरासत ने अब कानूनी लड़ाई का रूप ले लिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा हिरासत आदेश रद्द करने और मुआवजे का निर्देश देने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है।
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देगी सरकार
नोएडा में एक छात्र को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत हिरासत में लेने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार अब सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में इसकी जानकारी दी।
मामला उस समय और महत्वपूर्ण हो गया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छात्र की हिरासत को रद्द करते हुए प्रशासनिक कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए थे।
छात्र को 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी NSA हिरासत आदेश को रद्द कर दिया था। अदालत ने छात्र को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया। आदेश में यह रकम संबंधित अधिकारी के वेतन से वसूलने की बात कही गई थी।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि हिरासत का आदेश उचित तरीके से विचार किए बिना जारी किया गया था। इस टिप्पणी ने प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर बहस तेज कर दी।
मजदूर प्रदर्शन से जुड़ा है मामला
यह मामला ग्रेटर नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़ा बताया गया है। इसी घटनाक्रम के दौरान एक छात्र को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस नोटिस पर सवाल उठाया।
अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि जब छात्रों के प्रदर्शन में शामिल होने पर सख्त कार्रवाई से संबंधित निर्देश मौजूद हैं, तो फिर ऐसा नोटिस किस आधार पर जारी किया गया।
नोटिस को लेकर भी हुआ स्पष्टीकरण
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को स्पष्ट किया कि जिस नोटिस को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वह नोएडा DM ने जारी नहीं किया था। यह नोटिस ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी किया गया था।
इस स्पष्टीकरण के बाद मामले में अलग-अलग अधिकारियों की भूमिका को लेकर तस्वीर कुछ साफ हुई।
अब सुप्रीम कोर्ट में होगी अगली लड़ाई
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के सरकार के निर्णय के बाद अब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने जाएगा। वहां यह तय होना अहम होगा कि छात्र की NSA हिरासत कानूनी कसौटियों पर सही थी या नहीं और हाईकोर्ट द्वारा दिए गए मुआवजे के आदेश का क्या भविष्य होगा।
अधिकार और प्रशासनिक शक्ति की परीक्षा
यह मामला सिर्फ एक छात्र की हिरासत तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल भी है कि प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में प्रशासन अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किस सीमा तक कर सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर नजर रहेगी। वहां होने वाली कानूनी बहस यह तय कर सकती है कि इस मामले में प्रशासनिक कार्रवाई को सही ठहराया जा सकता है या हाईकोर्ट की आपत्तियां बरकरार रहेंगी।
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